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Ajab Gajab : दूल्हा नहीं बल्कि यहां दुल्हन लेकर पहुंचती है बारात, दूल्हे के घर होते हैं 7 फेरे, अनोखी परंपरा

Sirmour News :भारत की अधिकांश शादियों में आपने दूल्हे को ही बारात लेकर दुल्हन के घर जाता देखा है। लेकिन भारत के इस राज्य में हो रही अनोखी शादी। दुल्हन आती है दूल्हे के घर पर बारात लेकर।

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Ajab Gajab : दूल्हा नहीं बल्कि यहां दुल्हन लेकर पहुंचती है बारात, दूल्हे के घर होते हैं 7 फेरे, अनोखी परंपरा

Saral Kisan, Ajab Gjab : भारत के सिरमौर के गिरी परी इलाके में हाथी जनजाति के लोग रहते हैं, भारत का यह इलाका जनजातीय क्षेत्र कहलाता है। हाल ही में भारत की केंद्र सरकार ने जनजाति को एचडी का दर्जा दिया है। और इसी हाथी जनजाति में शादी की है अनोखी परंपरा चलती आ रही है, इस परंपरा के पीछे कोई खास कारण नहीं है।

मिली जानकारी के मुताबिक माना जाता है कि पुराने समय में देश में गरीबी अधिक होती थी। और जनसंख्या नियंत्रण न होने के कारण बच्चे भी दो से अधिक होते थे। बाथरूम की संख्या अधिक होने के कारण लोग धूमधाम से शादी नहीं कर पाते थे और लोगों के पास संसाधन सीमित होते थे, इस कारण ही दूल्हे के घर पर सारी रा मेरी बात एक जगह ही की जाती थी। परंतु अभी है परंपरा एक तरह से विलुप्त ही हो चुकी है।

इसी वर्ष हुई थी शादी

इस वर्ष जनवरी महीने में उत्तराखंड के सिमर जिले में हुई थी। इस अनोखी शादी में 100 बारातियों बैंड बाजों और घोड़ी के साथ एक लड़की उत्तराखंड के चकराता से बारात लेकर सिमोर जिले पहुंची थी. इसमें चकराता से सुमन की शादी सिरमौर में के राजेंद्र के साथ हुई थी।

गिरिपार में चार तरह के शादियों की परंपरा

बताया जाता है कि जनजातीय क्षेत्र गिरिपार में पुरानी परंपराएं हैं. उनके अनुसार चार तरह से शादियां होती हैं. पहली परंपरा के अनुसार, बाला ब्याह परंपरा में पहले ही लड़की की शादी की बात पक्की हो जाती थी. कई बार तो बच्चे के जन्म से पूर्व भी रिश्ता तय किया जाता था. दूसरी परंपरा झाजड़ा परंपरा है, जिसमें दूल्हा बारात लेकर दुल्हन के घर नहीं जाता.  तीसरी परपंरा को विवाह खिताइयूं कहते हैं. इसमें एक से अधिक शादियां करने वाली लड़की की शादी विवाह को खिताइयूं कहते हैं. चौथे प्रकार है हार प्रथा. इसमें लड़की या कोई महिला अपनी इच्छा से किसी व्यक्ति के साथ भाग जाती है तो उसे हार विवाह कहते हैं. लड़की को भगाने वाले शख्स पर जुर्माना लगाया जाता है., जिसे हरोंग कहते हैं. लेकिन अब ये सभी परंपराएं लगभग खत्म हो गई है.

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